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जगद्गुरू श्री रामानन्दाचार्य स्वामी जी श्री रामनेशाचार्य जी महाराज, श्रीमठ काशी

    जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामनरेषाचार्य जी महाराज
श्रीमठ काषी उतर प्रदेश भारत

            परमात्मा के दो प्रकार के अवतार शास्त्रों में स्वीकृत हैं । नित्य एवं नैमित्तिक अवतार । किसी निमित्त अर्थात् विषेष प्रयोजन, जैसे रावण कुम्भकरण, षिषुपाल दन्तवक्र, कंस आदि दुष्टों का विनाष करने हेतु जो अवतार होता है उसे नैमित्तिक अवतार कहते है ये अवतार राम-कृष्ण आदि के रूप में यदाकदा होते है। जो अवतार किसी निमित्त विषेष के बिना नित्य निरंतर संसार के जीवों पर अहैतुकि अनुकम्पा करके सभी युगों में सर्वत्र होते है, उन्हें नित्यावतार कहते हैं । ये अवतार सन्तों, आचार्यों तथा भगवत भक्तों के रूप में होते है । जैसे शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, वल्लभाचार्य, निम्बार्काचार्य, रामानन्दाचार्य, चैतन्य महाप्रभु आदि । 
           इन्हीं नित्यावतारों में काषी श्रीमठ पीठाधीष्वर जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामनरेषाचार्य जी महाराज, एक अन्यतम उल्लेखनीय है । 


          जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज का अवतार पुण्यभूमि भारतवर्ष के बिहार प्रान्त के भोजपुर जिले में परसियाग्राम में, पुण्यात्मा पंडित जगन्नाथ शर्मा के पुत्र के रूप में माघ शुक्ल पंचमी, संवत् 2008 तद्नुसार गुरूवार दिनांक 31 जनवरी सन् 1952 ई. में हुआ । इनका बचपन का नाम स्वभावतः श्री कृष्ण होने के कारण श्री कृष्ण शर्मा रखा गया,  इनकी प्रारम्भिक षिक्षा - दीक्षा  जन्मभूमि में हुई । बाल-सुलभ  चापल्य से विमुक्त होकर, निरन्तर अध्ययन करना आपका स्वभाव था। संसार से विरक्ति होने के कारण अल्पावस्था में ही मात्र 16 वर्ष की आयु में मोह-माया का त्याग कर आप काषी आ गये । यहां सन्त प्रवर रधुवर गोपलदास जी महन्त से वैष्णवी विरक्त दीक्षा ग्रहण कर आप श्रीकृष्ण शर्मा से श्री रामनरेषदास हो गये । श्री रामनरेषदास जी ने अपने दीक्षा गुरू से ही, सिद्वान्त -कौमुदी और तर्क-संग्रह का अध्ययन किया । आपने स्वामी लक्ष्मणाचार्य कोष्टाचार्यजी, आचार्य ब्रदीनाथ शुक्ल, पंडित सुब्रह्मण्यम, शास्त्री पंडित गयादीन मिश्र आदि विद्वानों ने न्याय, व्याकरण, बेदान्त, मिमांसा, सांख्य योग आदि शास्त्रों का गहन अध्ययन किया साथ ही नित्य प्रति शताधिक विद्या-पिपासु छात्रों को (जिसमें गृहस्थ एवं विरक्त संन्त सम्मिलित थे) शास्त्रों का अध्ययन कराते थे । आपकी वैदुष्यपूर्ण, सुबोध, एवं सरल अध्यापन शैली की चर्चा समस्त काषी में फैल गई । अतः आप अल्पावधि में ही काशी के विद्वानों में एक युवा विद्वान के रूप में प्रतिष्ठित हो गये । आपने सम्पूर्णानन्द विष्वविद्यालय से न्याय-आचार्य की परीक्षा उत्तीर्ण की । इसी बीच आपको, भारत के अनेक प्रतिष्ठित सन्तों का सत्संग भी उपलब्ध हुआ । आपके सत्संगी सन्तों में दक्षिणामूर्ति मठ के संस्थापक महामंडलेष्वर स्वामी नृसिंहगिरीजी महाराज, विरक्त संत षिरोमणि स्वामी वामदेवजी, स्वामी गंगदेवजी, स्वामी श्यामाषरण जी आदि नाम विषेष उल्लेखनीय है । ये सभी संत विद्या, उम्र व साधुता में श्रेष्ठ होेने पर भी आपको अपने समकक्ष सम्मान प्रदान किया करते थे और आप सभी सन्तों का हदय से सम्मान करते थे । विरक्त सन्तों में अधिक रहने से आपका रहन-सहन विरक्तों जैसा ही था । 


          देवयोग से कैलाष पीठाधीष्वर महामण्डलेष्वर स्वामी विद्यानन्द गिरिजी महाराज, कैलाष आश्रम ऋषिकेश आपके विद्यायष से बहुत प्रभावित हुए तथा अपने आश्रम में विरक्त सन्तों को शास्त्रों का गहन अध्ययन कराने के लिए अपने स्नेहपूर्ण निमन्त्रण पर आपके ऋषिकेष बुला ही लिया । कैलाष आश्रम की शाखा, दसनाम सन्यास आश्रम हरिद्वार में रहकर 1963 से 1988 तक आपने शताधिक विद्याथियों को शास्त्रों का गहन अध्ययन कराया । इसी बीच, कैलाश आश्रम के प्रसिद्ध श्रोतिय ब्रह्मनिष्ठ सन्त स्वामी हरिहर तीर्थजी महाराज का सान्निध्य भी आपको प्राप्त हुआ । कैलाष आश्रम के महामण्डलेश्वर जी, तीर्थजी, सन्तों व भक्तों का मन था कि आप सन्यास लेकर कैलाष आश्रम की ब्रह्मविद्यापीठ को सुषोभित करें । इसी बीच, वैष्णव सन्तों ने देखा कि हमारी विभूति का उपयोग दुसरे सम्प्रदाय में हो रहा है, अतः तत्कालीन अनेक वैष्णव वरिष्ठ सन्तों ने आपसे सम्पर्क कर जगद्गुरू रामानंदाचार्य पीठ पर प्रतिष्ठित होने का विनम्र आग्रह किया । बार-बार आग्रह करने पर आप, अपनी लीला का विस्तार करने के लिए 11 जनवरी 1988 ई को रामानन्द जयन्ती के सुअवसर पर श्रीमठ की पावन रामानन्दपीठ पर प्रतिष्ठित हो, जगद्गुरू रामानन्दचार्य स्वामी रामनरेषाचार्य के रूप में अभिलाषित हुए । 
        जब आपने काषी के श्रीमठ में अभिनव रामानन्दाचार्य के रूप में पर्दापरण किया तब, काषी की ऐतिहासिक होते हुए भी एक लापता, गुमनाम आचार्य पीठ आलोकित हो उठी । 


        अयोध्या, काषी, चित्रकूट, वृन्दावन, हरिद्वार आदि स्थल रामानन्दीय साधुओं के गढ़ हैं । जो महन्त, बड़े सन्त इन स्थलों पर रहते हैं, वे भले ही पहले अपनी आचार्य पीठ को नहीं जानते थे, किन्तु वर्तमान जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामनरेषाचार्य जी महाराज से सुपरिचित थे । साथ ही दसनाम सन्यासी समाज के सभी महामण्डलेष्वर अखाड़ों के महन्त, उदासीन गरीबदास जी, घीसा पंथी, निर्मल पंथी, कबीर पंथी, एवं अन्य सम्प्रदायों के लक्ष्याधिक सन्त महात्मा आपसे सुपरिचित थे । अतः आपसे रामानन्दचार्य पीठ का महत्व, उसी प्रकार बढ़ा जैसे चन्द्रमा से रात्रि का महत्व बढ़ जाता है 25 वर्ष में देष के चारों शंकराचार्य के समकक्ष इस पीठ का प्रभाव स्थापित आपके ही प्रभाव के कारण हुआ । श्रृंगेरी, द्वारिका, पुरी, ज्योतिषपीठ इन चारेां शंकराचार्यों के साथ आपकी, अनेक धर्म सभाएं एवं धर्म व देश की वर्तमान परिस्थितियों पर अनेक बार संगोष्ठियां हुई है । 
       जब केन्द्रीय सरकार पर अन्तराष्ट्रीय दबाव पड़ा कि आप यदि परिस्थिति वष आयोध्या में श्री रामजन्म भूमि पर राम मन्दिर बनाने की स्वीकृति देते है तो, भारत के अराजनैतिक धर्माचार्यों के द्वारा मन्दिर का निर्माण करायें । उस समय,देश के सामने यह संकट था कि अधिकाधिक सन्त एवं धर्माचार्य राजनीति से प्रेरित थे । कुछ तो रामजन्मभूमि के नाम पर चुनाव लड़कर संसद में निर्वाचित होकर संसद सदस्य थे । उस समय द्वारका पीठाधीष्वर जगद्गुरू शंकराचार्यजी स्वामी स्वरूपानन्द जी महाराज, श्रृंगेरी पीठीधीष्वर, जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी भारती तीर्थजी महाराज आदि के साथ जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामनरेषाचार्य महाराज, कांचीपीठ के जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती तथा उडड्पी के जगद्गुरू मध्वाचार्य स्वामी विष्वेषतीर्थ जी पर भारत सरकार की दृष्टि गई और उक्त सन्तों से निवेदन कर मन्दिर निर्माण हेतु रामालय न्यास का गठन हुआ। इसमें आपकी प्रमुख एवं महत्वपूर्ण भूमिका थी । आपका, विष्व हिन्दू परिषद द्वारा यदि मन्दिर निर्माण होता है तब भी पूर्ण सहयोग रहेगा । यह घोषित हैं । आपका कहना है, मन्दिर बनना चाहिए, चाहे कोई बनाये । जो बनायेगा, वही धन्य होगा । 


       आज जब देश के जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, सम्प्रदायवाद के नाम पर घिनौनी राजनीति का खेल खेला जा रहा है, उस समय रामानन्दी जी की मूल विचारधारा ‘जाति-पांति पूछे नहीं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई के विचार का भण्डा हाथ में लेकर समूचे देश में एकता, अखण्डता परस्पर सद्भाव का प्रसार आप कर है । इन्दौर के प्रसिद्ध धर्मस्थल गीताभवन में इसी ध्येय से वाल्मीकि समाज के द्वारा वाल्मीकिजी की मूर्ति का संस्थापन आपकी प्ररेणा से कराया गया । साथ ही सेन समाज में उत्पन्न सेनाचार्य की मूर्ति भी स्थापित कराई गई । आपका संकल्प है कि रामानन्दाचार्य के विभिन्न जाति के बारह शिष्यों के नाम पर द्वादष पीठों की स्थापना कर द्वादष उपाचार्यो की नियुक्ति की जाय। इसी क्रम में सेनाचार्य के रूप में स्वामी अचलानन्द जी की नियुक्ति हुई । 


       यू तो भारतवर्ष में रामानन्दीय परम्परा से सम्बद्ध लाखों मठ हैं, किन्तु आपके पीठासीन होने के पूर्व काषी श्रीमठ मूलपीठ के अधीन कोई अन्य आश्रम या मठ नहीं था। अभी आपके दीक्षा-गुरू, महन्त रघुवर गोपालदास जी का विषाल मठ, जो काशी में ही है ै वह श्रीमठ के अधीन हो गया है। नर्मदा तट जबलपुर के समीप जिलहरी घाट प्रेमानन्द आश्रम न्यास के अध्यक्ष भी आप ही है । वहां अन्नक्षेत्र, गौषाला तथा गोपाल पद्मावती वेद वेदान्त विद्यालय आदि अनेक सत्कार्य आपके ही संरक्षण में चल रहे है । इन्दोर हरिक्षर आदि स्थानों में शीघ्र ही आश्रमों का निर्माण होना सुनिष्चित है । 
      श्रीमठ में आपके पर्दापण के बाद श्रीमठ के महोत्सवों में पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानीजेलसिंह, पूर्व प्रधानमन्त्री स्व. राजीव गांधी, उत्तरप्रदेष के पूर्व राज्यपाल माननीय बी. सत्यनारायण रेड्डी, श्री मोतीलाल जी वोरा, पूर्व मुख्यमन्त्री श्री अर्जुनसिंह जी, श्री दिग्विजयसिंह जी मुख्यमन्त्री मध्यप्रदेष आदि देश के राजनयिक गण सम्मिलित हुए है । सभी प्रमुख शंकराचार्यों, मध्वाचार्य सहित अनेक प्रमुख सन्तों के समागम वहां होते रहे हैं । 
      आपने आंकारेष्वर से अयोध्या तक रामभाव प्रसार यात्राकर राम जी के परम उदार भावों का प्रसार किया । निरंतर लोक-कल्याण के अहर्निष कार्यों में संलग्न हैं, रहते है । आपकी शास्त्रों के गहन अध्ययन -अध्यापन में विषेष रूचि है । कार्तिक मास में काषी के पंचगंगा घाट का बड़ा पौराणिक माहात्म्य है । इसके अनुरूप आपने पंचगंगा घाट पर प्रतिवर्ष प्रकाश पूर्व कार्तिक मास में दिव्य कार्तिक मास महोत्सव की परंपरा शुरू कर काशी की आध्यात्मिक संस्कृति को नया आयाम दिया है । 
       उत्तरप्रदेष, बिहार, गुजरात, मध्यप्रदेष, राजस्थान, महाराष्ट्र, पंजाब हिमांचल प्रदेष आदि प्रदेषों में आपके लाखों लाख दीक्षित षिष्य आपके मार्गदर्षन में आत्म कल्याण की ओर से अग्रसर है । जगद्गुरू रामानन्दाचार्य जी स्वामी रामनरेषचार्य जी महाराज का चातुर्मास जब भी समाप्त होता है उसके बाद वे भक्तों के साथ आस-पास के तीर्थ स्थानों पर जाकर अपने आराध्य का दर्षन - पूजन करने जाते है । यह स्वामी जी का संकल्प रहता है ।  


      अयोध्या में राममन्दिर नहीं बनने से जगद्गुरू रामानन्दाचार्य जी स्वामी रामनरेषचार्य जी को बड़ा ही मलाल रहा इसी लिए उन्होंने अपने सान्निध्य में तीर्थ स्थली हरिद्वार में राम मन्दिर बनाने का सकल्प किया था और सनातन्त संस्कृति का पर्याय भगवान श्री राम का चरित्र, विश्व संस्कृति का आधार एवं वेदो से अनुप्रमाणित स्मृति पुराण न केवल भारत बल्कि विश्व के युग निर्माण का प्रतीत है ऐसे भगवान श्री राम का सम्पूर्ण जीवन चरित्र को परिदृश्य करने वाला अनूठा एवं अद्वितीय श्रीराम मन्दिर का निर्माण चार धामों में सुप्रतिष्ठ ब्रदीधाम के द्वार भूत हरिद्वार में निर्मित हो रहा है ।

     इस अद्वितीय श्री राम मन्दिर के निर्माण का शिल्यान्यास दिनांक 18 नवम्बर 2005 को जगतगुरू मध्वाचार्य स्वामी विश्वेशतीर्थ जी महाराज उडड्पी कर्नाटक के कर कमलो द्वारा स्वामी श्री रामनरेशाचार्य आजीवन संस्थापक अध्यक्ष जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्मारक सेवान्यास (पंजीयन संख्या 192/2001 दिनांक 19.06.2001) के सानिध्य में भूमि पूजन के साथ सैकडो राष्ट्रीय स्तर के संतो, मठाधीशों, भक्तों एवं विद्वानों की उपस्थिति में किया गया जो निर्माण निरन्तर तेजी से चल रहा है ।

     भूतल, प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय तल का निर्माण जोधपुरी पत्थर द्वारा किया जा रहा है जिसमें ग्राऊण्ड में श्रीराम, लक्ष्मण व श्री जानकी जी की बैठी हुई प्रतिमायें होगी। फस्ट फ्लोर में भगवान श्रीरामचन्द्रजी की चैबीस अवतार रहेंगे और सेकण्ड फ्लोर में श्रीरामचन्द्र जी के जीवन चरित्र का पट्टचित्र बनेगा, जो भगवान श्रीराम के जन्म से लेकर पूर्ण जीवन रचना रहेगी । 
    
ऐसे गुरू पाकर वैष्णव सम्प्रदाय धन्य हो गया है ऐसे गुरू को वैष्णव बेवसाईट परिवार की ओर से सत् सत् नमन । 

अनन्य षिष्य

गौरव निम्बावत,एडवोकेट(राघव)
9829098564(मो.)

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